शिमला। आज का युवा देश का भविष्य है, लेकिन वर्तमान में यह भविष्य तंबाकू के धुएं और इसके विभिन्न उत्पादों के जाल में फंसकर धुंधला होता जा रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की हालिया रिपोर्टों ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है कि युवाओं में बढ़ता तंबाकू का चलन केवल एक व्यक्तिगत बुरी आदत नहीं है।
इसके पीछे तंबाकू उद्योग (Tobacco Industry) की सोची-समझी, आक्रामक और अनैतिक मार्केटिंग रणनीतियाँ काम कर रही हैं।
ग्लोबल हेल्थ वॉचडॉग और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, तंबाकू कंपनियाँ अपने उन पुराने ग्राहकों की जगह (जो तंबाकू जनित बीमारियों के कारण दम तोड़ रहे हैं) नए ‘आजीवन ग्राहक’ तैयार करने के लिए सीधे बच्चों और युवाओं को टारगेट कर रही हैं।
इसके लिए सिगरेट, बीड़ी, गुटका और आधुनिक दौर के ई-सिगरेट (Vaping) का सहारा लिया जा रहा है।
तंबाकू कंपनियों ने युवाओं को अपने जाल में बांधने के लिए बेहद शातिर रणनीतियाँ अपनाई हैं :
● आकर्षक फ्लेवर्स और छलावा (Kid-Friendly Flavours): तंबाकू के कड़वे स्वाद को छिपाने के लिए स्ट्रॉबेरी, मिंट, कॉटन कैंडी और बबलगम जैसे 15,000 से अधिक फ्लेवर वाले उत्पाद बाजार में उतारे गए हैं। इससे युवाओं में यह गलत धारणा बनती है कि ये उत्पाद सुरक्षित हैं।
● स्लीक और हाई-टेक डिज़ाइन: आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक निकोटीन उत्पादों (ENDS) को पेन, पेनड्राइव (USB) या गैजेट्स जैसे छोटे डिज़ाइनों में तैयार किया जाता है। ये दिखने में ‘कूल’ लगते हैं और बच्चे इन्हें आसानी से माता-पिता या शिक्षकों से छिपा लेते हैं।
● पॉइंट ऑफ सेल (POS) पर ‘टार्गेटेड डिस्प्ले’: एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, कंपनियाँ जानबूझकर दुकानों पर उत्पादों को बच्चों की आँखों के स्तर (लगभग 1 मीटर की ऊँचाई) पर और चॉकलेट-बिस्कुट के ठीक बगल में रखवाती हैं, ताकि बचपन से ही इसकी छवि दिमाग में सामान्य बन जाए।
● ‘सिंगल स्टिक’ की सुगमता: पूरी डिब्बी के बजाय एक या दो सिगरेट बेचना युवाओं के लिए इसे आर्थिक रूप से सुलभ बनाता है। साथ ही, वे पैकेट पर छपी ‘सचित्र वैधानिक चेतावनी’ को देखने से भी बच जाते हैं।
● सोशल मीडिया और ‘सरोगेट’ विज्ञापन: सीधे विज्ञापनों पर प्रतिबंध होने के कारण फिल्में, वेब सीरीज़ और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के माध्यम से धूम्रपान को ‘तनाव दूर करने का जरिया’ या ‘स्टाइल’ के रूप में परोसा जा रहा है।
साइंस की जुबानी : कैसे काम करता है लत का यह “इनाम चक्र” (Reward Mechanism)
आखिर एक बार तंबाकू चखने के बाद युवा चाहकर भी इसे क्यों नहीं छोड़ पाते?
इसके पीछे इंसानी दिमाग और तंबाकू के अंदर मौजूद हानिकारक तत्वों का एक खतरनाक वैज्ञानिक खेल है।
इसे हम 4 आसान स्टेप्स में समझ सकते हैं :
1. विलेन की एंट्री (निकोटीन) : तंबाकू में बेहद नशीला केमिकल ‘निकोटीन’ होता है। धूम्रपान करने या तंबाकू चबाने पर यह निकोटीन खून के रास्ते मात्र 7 से 10 सेकंड में सीधे दिमाग (Brain) तक पहुँच जाता है।
2. दिमाग का “खुशी वाला केमिकल” (Dopamine Release) : दिमाग में पहुँचते ही निकोटीन रिसीवर्स को ट्रिगर करता है, जिससे ‘डोपामाइन’ नाम का केमिकल रिलीज होता है।
यह दिमाग का “फील-गुड” या “इनाम” वाला केमिकल है, जो इंसान को अचानक नकली खुशी, सुकून और तनावमुक्ति का अहसास कराता है।
3. दिमाग का शॉर्टकट : हमारा दिमाग सुखद अनुभवों को याद रखता है। वह सोचता है कि तंबाकू खाने या पीने से इतनी जल्दी सुकून मिला, तो यह बहुत बढ़िया चीज है।
4. रिवॉर्ड साइकिल का जाल : कुछ ही देर में निकोटीन का असर कम होते ही डोपामाइन का लेवल गिर जाता है। लेवल गिरते ही इंसान को चिड़चिड़ाहट और बेचैनी होने लगती है।
इस बेचैनी (क्रैविंग या तलब) को मिटाने के लिए इंसान दोबारा तंबाकू लेता है और यह चक्र बार-बार चलता रहता है।
लत (Addiction) का असली सच :
धीरे-धीरे दिमाग को इस निकोटीन की इतनी आदत हो जाती है कि वह सामान्य रूप से डोपामाइन बनाना कम कर देता है। अब इंसान को सामान्य (Normal) महसूस करने के लिए भी तंबाकू की जरूरत पड़ने लगती है। इसी को साइंस की भाषा में ‘एडिक्शन’ कहते हैं।
होश उड़ाने वाले आंकड़े और जनसांख्यिकीय खतरा
वैश्विक आंकड़ों की मानें तो तंबाकू की शुरुआत करने वाले लगभग 80% से अधिक युवा 18 वर्ष की आयु से पहले ही इसके आदी हो जाते हैं।
भारत में भी स्कूली बच्चे ‘पीयर प्रेशर’ (दोस्तों के दबाव) और इस अदृश्य कॉर्पोरेट जाल का शिकार हो रहे हैं।
इसका नतीजा यह है कि हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर और कम उम्र में रीढ़ की हड्डियों की कमजोरी (Spine issues) जैसी गंभीर बीमारियाँ अब 20 से 30 वर्ष के युवाओं में आम होती जा रही हैं।
समाधान की राह : अब जागने का समय है
विशेषज्ञों का कहना है कि इस महामारी से निपटने के लिए केवल जागरूकता काफी नहीं है, बल्कि तंबाकू उद्योग की इन अनैतिक रणनीतियों पर कड़ा प्रहार करना होगा :
● कड़े कानूनों का प्रवर्तन (COTPA Enforcement): शिक्षण संस्थानों के 100 गज के दायरे में तंबाकू उत्पादों की बिक्री और पॉइंट-ऑफ-सेल विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध सख्ती से लागू हो।
● फ्लेवर्स पर पूर्ण प्रतिबंध : ई-सिगरेट और बच्चों को लुभाने वाले अन्य फ्लेवर्ड उत्पादों पर पूरी तरह से कानूनी रोक लगाई जाए।
● मदद का हाथ (टोबैको काउंसलिंग सेंटर) : सरकार द्वारा हर डेंटल और मेडिकल कॉलेज में ‘टोबैको काउंसलिंग सेंटर’ बनाए गए हैं, जहाँ वैज्ञानिक तरीकों से तंबाकू छोड़ने में विशेषज्ञों द्वारा सहायता की जाती है।
● सामूहिक आंदोलन : अभिभावकों, शिक्षकों और डॉक्टरों को मिलकर युवाओं को इस ‘कॉर्पोरेट जाल’ के बारे में शिक्षित करना होगा।
तंबाकू उद्योग के लिए युवा पीढ़ी महज एक ‘मार्केट शेयर’ और ‘आजीवन मुनाफे का जरिया’ है, जबकि देश के लिए यह उसकी रीढ़ है।
यदि समय रहते इस आक्रामक कॉर्पोरेट चक्रव्यूह को नहीं तोड़ा गया, तो देश को एक बहुत बड़ी स्वास्थ्य और आर्थिक क्षति उठानी पड़ेगी।
समय की मांग बेहद साफ है : तंबाकू के जाल को पहचानें, युवा और जिंदगी को चुनें।
लेखक :
डॉ अतुल संख्यान ( लेक्चरर )
डिपार्टमेंट ऑफ़ पब्लिक हेल्थ डेंटिस्ट्री
एचपी गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज, शिमला
