कोरोना महामारी के बीच काफल बना गरीब परिवारों की आर्थिकी का सहारा

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जोगिन्दर नगर। वैश्विक महामारी करोनो वायरस (कोविड-19) के इस दौर में जहां पूरी दुनिया मेें करोड़ों लोगों की नौकरियों पर संकट के बादल छाए हुए हैं तो वहीं धीमी आर्थिक रफतार के बीच बेरोजगारों के लिए रोजगार का सफर भी मुश्किल भरा हो सकता है।

लेकिन ऐसे में जब बात गरीबों की हो तो ऐसे परिवारों के लिए इस संकट भरे दौर में दो वक्त की रोजी-रोटी का जुगाड़ करना किसी चुनौती से कम नहीं है। भले ही सरकारी स्तर पर गरीब परिवारों को अन्न उपलब्ध करवाने में सरकार ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है, परन्तु परिवार की अन्य मूलभूत सुविधाओं का जुगाड़ करना गरीब परिवारों के लिए किसी पहाड़ को चढऩे से कम नहीं है।

ऐसे में कोरोना महामारी के बीच जंगली फल काफल आज कई गरीब व जरूरतमंद परिवारों की आर्थिकी को सहारा प्रदान कर रहा है।

जोगिन्दर नगर शहर में काफल बेच रहे हराबाग गांव के बीपीएल परिवार में शामिल 32 वर्षीय अजय कुमार से बातचीत की तो उनका कहना है कि दिहाड़ी मजदूरी कर वे अपना व परिवार का भरण-पोषण करते हैं।

मई व जून के दौरान काफल बेच कर अपनी आर्थिकी को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहे हैं। पांच लोगों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी संभाले अजय कुमार बतियाते हैं कि पिछले लगभग 10 वर्षों से वे यहां आकर काफल बेच रहे हैं।

उनका कहना है कि प्रतिदिन औसतन 5 से 7 सौ रूपये तक का काफल बिक जाता है। कोरोना महामारी के दौर में काफल उनके लिए रोजगार का एकमात्र सहारा बना है।

इसी तरह काफल बेच रहे नेरी के कोटला गांव निवासी 70 वर्षीय गंगाा राम से बातचीत की तो उनका कहना है कि मछली बेचकर ही उनके परिवार का भरण पोषण चलता है, लेकिन मई व जून माह के दौरान काफल उनकी आर्थिकी में मददगार साबित होता है।

पिछले लगभग 55 वर्षों से काफल बेच रहे बीपीएल परिवार में शामिल गंगा राम का कहना है कि महामारी के इस दौर में चार लोगों का भरण पोषण एक बड़ी चुनौती बन गया है। लेकिन पिछले एक सप्ताह से काफल बेचकर वे परिवार की गाड़ी को हांकने का प्रयास कर रहे हैं।

यही नहीं नारला गांव में फ्रूट की रेहड़ी लगाकर जीवन की गुजर-बसर कर रहे बीपीएल परिवार में शामिल 41 वर्षीय प्रदीप कुमार का कहना है कि महामारी के इस दौर में 7 लोगों का पेट पालना बड़ी चुनौती है।

लॉकडाउन के कारण उनका रेहड़ी का काम ठप्प होकर रह गया है ऐसे में पिछले लगभग एक सप्ताह से जोगिन्दर नगर पहुंचकर काफल बेचने का काम कर रहे हैं। इससे उन्हे औसतन 600 रूपये तक की आमदन हो रही है।

कुल मिलाकर महामारी के इस संकट भरे दौर में जंगली फल काफल कई गरीब परिवारों की आर्थिकी का सहारा बना है।

इस बारे आयुर्वेद विशेषज्ञों का कहना है कि जंगली फल काफल हिमाचल प्रदेश के एक विशेष क्षेत्र में ही पाया जाता है। मई व जून में पक कर तैयार होने वाला यह फल खाने में न केवल स्वादिष्ट है बल्कि कई बीमारियों में राम बाण का काम करता है।

कैंसर सहित कई रोगों में लाभकारी काफल शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम भी करता है। साथ ही काफल अस्थाई तौर पर स्थानीय ग्रामीणों के लिए एक रोजगार का अवसर भी प्रदान करता है।

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