भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में धर्म और साहित्य की अंतःसंबंधिता पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

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शिमला। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS), शिमला में भारतीय बौद्धिक परंपरा में धर्म और साहित्य की अंतःसंबंधिता का पुनर्पाठ” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ आज ऐतिहासिक राष्ट्रपति निवास परिसर में हुआ।

उद्घाटन सत्र में प्रतिष्ठित विद्वानों ने भारतीय ज्ञान-परंपरा में धर्म और साहित्य के गहरे अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला तथा उसे वर्तमान वैश्विक एवं सांस्कृतिक संदर्भ में पुनः विवेचित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन से हुई, जिसमें मंचस्थ अतिथियों प्रो बालगणपति देवरकोंडा (आयोजक), प्रो संजीव कुमार एचएम (सह-आयोजक) एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया।

प्रो बालगणपति देवरकोंडा (विश्वविद्यालय दिल्ली) ने स्वागत भाषण में कहा कि भारतीय साहित्य और धार्मिक परंपराएं हमेशा से एक-दूसरे को प्रभावित करती रही हैं, और आधुनिक विमर्श में इनकी पुनःमीमांसा आवश्यक है ताकि ज्ञान-परंपरा का स्वदेशी स्वर पुनः सशक्त हो सके।

प्रो संजीव कुमार एच.एम. (राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने संगोष्ठी की विषयवस्तु का परिचय देते हुए बताया कि यह विमर्श केवल अकादमिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्पाठ का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।

उन्होंने धर्म को जीवन का मार्गदर्शक बताया जो साहित्य के माध्यम से सामाजिक चेतना में प्रवेश करता है।

मुख्य वक्ता के रूप में प्रो सिद्धार्थ सिंह (कुलपति, नव नालंदा महाविहार, बिहार) ने ऑनलाइन माध्यम से संबोधित करते हुए धर्म और साहित्य की पारंपरिक भारतीय अवधारणाओं को आधुनिक उपनिवेशोत्तर चिंतन के आलोक में रखा।

उन्होंने कहा कि नालंदा से लेकर वर्तमान बौद्धिक परंपरा तक धर्म और साहित्य का अंतर्संबंध भारतीय चिंतन की मूल आत्मा है।

अध्यक्षीय संबोधन प्रो शशिप्रभा कुमार (अध्यक्ष, शासी निकाय, आईआईएएस) द्वारा ऑनलाइन माध्यम से प्रस्तुत किया गया। उन्होंने भारतीय दार्शनिक परंपराओं की व्याख्या करते हुए कहा कि धर्म और साहित्य, दोनों ही व्यक्ति और समाज के आत्मिक और सांस्कृतिक उन्नयन के माध्यम रहे हैं।

उद्घाटन सत्र का औपचारिक समापन संस्थान के सचिव श्री मेहर चंद नेगी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन और राष्ट्रगान के साथ हुआ। सत्र का संचालन संस्थान के जनसंपर्क अधिकारी अखिलेश पाठक द्वारा किया गया।

उद्घाटन के उपरांत अकादमिक सत्रों की श्रृंखला आरंभ हुई, जो भारतीय भाषाओं, दर्शन, इतिहास, राजनीति, संस्कृति और आधुनिकता के संदर्भ में धर्म-साहित्य की अंतःक्रियाओं का विश्लेषण करती है।

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