शिमला। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने शुक्रवार को भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस), राष्ट्रपति निवास, शिमला में आयोजित “कांगड़ा लघुचित्रों में लोक और ग्राम्य जीवन का चित्रण : भारतीय देशज कला-परम्परा का परिप्रेक्ष्य” विषयक कला शिविर में निर्मित कलाकृतियों की प्रदर्शनी एवं नवस्थापित कला दीर्घा का उद्घाटन किया।
इस अवसर पर उन्होंने कहा कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक पहचान उसकी आर्थिक समृद्धि से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक गुणवत्ता, रचनात्मक चेतना और अपनी विरासत के प्रति उसके सम्मान से होती है।
उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शनी केवल चित्रों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारत की जीवंत सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है।
अपने संबोधन में राज्यपाल ने भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान को इस महत्वपूर्ण पहल के लिए बधाई देते हुए कहा कि संस्थान लंबे समय से उच्च स्तरीय शोध, चिंतन और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर बौद्धिक विमर्श का अग्रणी केंद्र रहा है।
भारतीय संस्कृति, ज्ञान परम्पराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति इसकी प्रतिबद्धता सराहनीय है। उन्होंने कहा कि संस्थान ने विद्वानों, कलाकारों, शिल्पकारों और विद्यार्थियों को एक साझा मंच प्रदान कर परंपरा और ज्ञान के मध्य सार्थक संवाद स्थापित करने का कार्य किया है।
महान साहित्यकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि संस्कृति मन और आत्मा की व्यापकता है तथा कला उसकी संवेदनशील अभिव्यक्ति।
उन्होंने कहा कि भारत विश्व की उन प्राचीन सभ्यताओं में से है जिसकी कला-परम्परा हजारों वर्षों से निरंतर विकसित होती हुई आज भी जीवंत बनी हुई है।
भीमबेटका की गुफा चित्रकला से लेकर अजंता की भित्तिचित्र परम्परा, मंदिरों की मूर्तिकला से लेकर लघुचित्रों तक भारतीय कला ने समय के साथ अनेक रूप ग्रहण किए हैं, किंतु अपनी मौलिक पहचान को सदैव अक्षुण्ण रखा है।
राज्यपाल ने कहा कि भारतीय कला का आधार केवल सौन्दर्य नहीं, बल्कि ज्ञान, अध्यात्म, लोकजीवन और सांस्कृतिक स्मृति भी है।
हमारे कलाकारों ने प्रकृति, लोककथाओं, धर्मग्रंथों, उत्सवों और जनजीवन से प्रेरणा लेकर ऐसे सृजन किए हैं जो पीढ़ियों को जोड़ते हैं और समाज को उसकी जड़ों से जोड़े रखते हैं।
उन्होंने कहा कि पारंपरिक कलाकार केवल कला तकनीकों के संरक्षक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों, लोककथाओं, प्रतीकों और सामाजिक स्मृतियों के संवाहक भी हैं।
तीव्र आधुनिकीकरण और बदलती जीवनशैली के दौर में ऐसे कलाकार हमारी सांस्कृतिक धरोहर के सच्चे प्रहरी हैं।
कांगड़ा लघुचित्र कला का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह भारतीय चित्रकला की महान परम्पराओं में विशिष्ट स्थान रखती है।
पहाड़ी चित्रकला शैली की यह उत्कृष्ट अभिव्यक्ति राजा संसार चंद के संरक्षण में अपने उत्कर्ष पर पहुँची। इसकी कोमल रेखाएँ, सूक्ष्म तूलिका-कार्य, रंगों का संतुलित प्रयोग, प्राकृतिक दृश्यों का मनोहारी चित्रण तथा मानवीय भावनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति इसे विश्व की श्रेष्ठ चित्रकला परम्पराओं में स्थान प्रदान करती है।
भागवत पुराण, गीत गोविंद, रामायण तथा लोक परम्पराओं से प्रेरित कांगड़ा चित्रकला कला, साहित्य, अध्यात्म और प्रकृति का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करती है।
उन्होंने कहा कि आज उद्घाटित की गई प्रदर्शनी विशेष रूप से लोक और ग्राम्य जीवन को कांगड़ा लघुचित्र शैली के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। भारतीय संस्कृति की वास्तविक शक्ति गांवों, लोक परम्पराओं, कृषि जीवन, उत्सवों, लोकगीतों और सामुदायिक स्मृतियों में निहित है।
गांव केवल भौगोलिक इकाइयाँ नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान के जीवंत केंद्र हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि कला शिविर में निर्मित चित्रकृतियाँ ग्रामीण जीवन की सादगी, जीवंतता और सांस्कृतिक समृद्धि को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
राज्यपाल ने कहा कि पारंपरिक कला रूपों के संरक्षण और पुनर्जीवन की आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक है। संरक्षण का अर्थ केवल कलाकृतियों को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उन कलाकारों और समुदायों को भी सशक्त बनाना है जो इन परम्पराओं को जीवित रखे हुए हैं।
उन्होंने कहा कि इस दिशा में संस्थानों, सरकारों, विद्वानों, कलाकारों और स्थानीय समुदायों को मिलकर कार्य करना होगा।
उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परम्पराओं और देशज सांस्कृतिक विरासत के महत्व को नई शिक्षा नीति में विशेष रूप से रेखांकित किया गया है तथा स्थानीय कला, शिल्प और विरासत आधारित आजीविकाओं को प्रोत्साहन देने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं।
इस अवसर पर भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रोफेसर हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने स्वागत उद्बोधन देते हुए कहा कि संस्थान द्वारा आयोजित यह कला शिविर अकादमिक विमर्श और जीवंत कला परम्पराओं के मध्य संवाद स्थापित करने का एक अभिनव प्रयास है।
उन्होंने कहा कि विगत पाँच दिनों के दौरान प्रतिष्ठित कलाकारों ने लोक एवं ग्राम्य जीवन, कृषि संस्कृति, लोक उत्सवों, पारंपरिक आस्थाओं तथा हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को कांगड़ा लघुचित्र और चंबा रूमाल कला के माध्यम से सृजनात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह नवस्थापित कला दीर्घा भविष्य में विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगी।
कार्यक्रम के दौरान संस्थान की ओर से माननीय राज्यपाल का हिमाचली शॉल, टोपी एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मान किया गया।
वरिष्ठ कलाकार धनी राम द्वारा राज्यपाल को कवि जयदेव कृत गीत गोविंद पर आधारित कांगड़ा शैली की एक विशेष चित्रकला भेंट की गई।
इस चित्र में यमुना तट पर रात्रिकालीन वातावरण में भगवान श्रीकृष्ण को बांसुरी वादन करते हुए तथा राधा को उन्हें पान अर्पित करते हुए चित्रित किया गया है।
प्रेम, समर्पण और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक यह चित्र अपनी सौंदर्यात्मक संवेदना तथा दिव्य आभा के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र रहा।
इस अवसर पर कला शिविर में सहभागिता करने वाले सभी कलाकारों को राज्यपाल द्वारा प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। प्रदर्शनी उद्घाटन के पश्चात उन्होंने कला दीर्घा का अवलोकन किया तथा कलाकारों से संवाद कर उनकी कृतियों की सराहना की।
उल्लेखनीय है कि भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान द्वारा 15 से 19 जून, 2026 तक आयोजित इस कला शिविर में छह प्रतिष्ठित कांगड़ा लघुचित्र कलाकारों तथा दो वरिष्ठ चंबा रूमाल कलाकारों ने सहभागिता की।
शिविर के दौरान निर्मित कलाकृतियों को संस्थान के स्थायी संग्रह का हिस्सा बनाया जाएगा और नवस्थापित कला दीर्घा में प्रदर्शित किया जाएगा, जिससे देश-विदेश से आने वाले शोधार्थियों, विद्वानों और पर्यटकों को हिमालयी कला परम्पराओं के इस महत्वपूर्ण आयाम से परिचित होने का अवसर प्राप्त होगा।
कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष कैप्टन रामेश्वर ठाकुर, संस्थान के राष्ट्रीय अध्येता, अध्येता, सह-अध्येता, कलाकार, तथा कला एवं संस्कृति जगत से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन डॉ अखिलेश पाठक, जनसंपर्क अधिकारी, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान द्वारा किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राजीव कुमार मिश्रा, पुस्तकालयाध्यक्ष एवं अकादमिक संसाधन अधिकारी ने प्रस्तुत किया।
