ग्रामीण भारत में वित्तीय समावेशन के लिए व्यापक सहयोग और विविध उत्पादों की आवश्यकता

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शिमला/ दिल्ली। गांवों में बिज़नेस कॉरेस्पोंडेंट्स (BCs) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्हें कई बार मिनी बैंक शाखाओं के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि वे देश के क्षेत्रीय ग्रामीण बाजारों में विभिन्न वित्तीय सेवाएं उपलब्ध कराते हैं।

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहां हर आधे किलोमीटर पर संस्कृति, जरूरतें और आकांक्षाएं बदल जाती हैं, एक ही मॉडल सभी क्षेत्रों पर लागू नहीं हो सकता।

जो शहरी क्षेत्रों में प्रासंगिक है, वह अर्ध–शहरी या टियर 2, 3, 4 शहरों में आवश्यक रूप से उपयुक्त नहीं हो सकता। हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्तीय क्षेत्र की बदलती आवश्यकताओं पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि भारत को अपनी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की विशाल पूंजीगत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़े और विश्व–स्तरीय बैंकों की आवश्यकता है। यह देश के वित्तीय क्षेत्र में एक नए सिरे से एकीकरण और विस्तार की दिशा में संकेत देता है।

वित्त मंत्री ने यह भी बताया कि सरकार RBI और वाणिज्यिक बैंकों के साथ संवाद कर रही है ताकि भारत की बैंकिंग प्रणाली के अगले चरण की रूपरेखा तैयार की जा सके।

वित्त मंत्री ने कहा कि भारत को कई बड़े, विश्व–स्तरीय बैंकों की आवश्यकता है और इसके लिए हमें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) तथा बैंकों के साथ बैठकर यह तय करना होगा कि उन्हें आगे कैसे बढ़ाया जाए।

उन्होंने संकेत दिया कि सरकार और RBI इस दिशा में कई मार्गों पर विचार कर रहे हैं जैसे मौजूदा बैंकों का विलय या नए संस्थानों का गठन ताकि भारत की आर्थिक प्रगति को समर्थन देने के लिए मजबूत वित्तीय क्षमता तैयार की जा सके।

भारत पहले ही दो बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक विलय के दौरों से गुजर चुका है। पहला 2017 में, जब SBI ने अपने सहयोगी बैंकों का विलय किया और दूसरा 2019 में, जब 10 सरकारी बैंकों का चार बड़े संस्थानों में एकीकरण किया गया। इन कदमों से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या 27 से घटकर 12 रह गई है।

भारत एक विविध देश है। हमारे पास कोई एक ऐसा मॉडल मौजूद नहीं है, जिसे कॉपी करके लागू किया जा सके। ‘आर्थिक आत्मनिर्भरता’ को हमारे अपने वास्तविकताओं, आवश्यकताओं और आकांक्षाओं
के अनुरूप आकार दिया जाना चाहिए, यह बात वित्त मंत्री ने स्पष्ट की।

अब तक वित्तीय समावेशन मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा संचालित था, जिसका उद्देश्य असंगठित और असुरक्षित आबादी को वित्तीय सुरक्षा के दायरे में लाना था।

वर्ष 2019 में राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन रणनीति (NSFI) शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य वित्तीय सेवाओं और उत्पादों तक पहुंच में मौजूद बाधाओं को दूर करना था ताकि हर गांव के 5 किमी के दायरे में एक औपचारिक वित्तीय सेवा प्रदाता उपलब्ध हो और ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया आसान, डिजिटल और कम–से–कम कागजी हो।
अब, वित्त मंत्री के हालिया बयान के साथ, यह आवश्यक है कि एक विश्व–स्तरीय बैंकिंग व्यवस्था विकसित की जाए, जो विशेष रूप से ‘भारत’ में रहने वाले लोगों की विविध जरूरतों को पूरा कर सके।
वित्तीय समावेशन अब एक परिवर्तनकारी मोड़ पर है, जहां PSU और निजी बैंक दोनों ही न सिर्फ बैंकिंग सेवाएं बल्कि म्यूचुअल फंड, लोन और अन्य वित्तीय योजनाएं एवं लाभ भी ‘भारत’ की जनता तक पहुंचाना चाहते हैं।
इसके लिए जरूरी है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, निजी बैंक और अन्य वित्तीय सेवा प्रदाता मिलकर नाममात्र शुल्क पर सेवाएं प्रदान करें जो संगठनों की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ रखे और उपभोक्ताओं को विविध सेवाओं तक पहुंच प्रदान करे।

वित्तीय समावेशन अभियान ने अब तक असंगठित आबादी को वित्तीय सुरक्षा के दायरे में लाने में बड़ी भूमिका निभाई है। आंकड़े भी इसका प्रमाण हैं, वित्तीय समावेशन सूचकांक (FI-Index) 2025 में बढ़कर 67% पर पहुंच गया है, जो 2021 के बाद से 24.3% की वृद्धि दर्शाता है।

प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत 55.98 करोड़ लाभार्थी जुड़ चुके हैं। FI-Index को 2021 में लॉन्च किया गया था, ताकि पूरे देश में बैंकिंग, निवेश, बीमा, पोस्टल और पेंशन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन
को मापा जा सके।
शाखाओं से परे बैंकिंग को ले जाने और वित्तीय रूप से सशक्त भारत बनाने की दूरदर्शिता अब सफल होती दिख रही है। दूरस्थ से लेकर शहरी क्षेत्रों तक,एक समावेशी वित्तीय प्रणाली की इस लहर को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। बैंक खाते, ऋण, पेंशन, बीमा जो कभी कुछ लोगों के लिए विलासिता थे अब सभी के लिए उपलब्ध हैं।

दुनिया वर्तमान में धीमी वैश्वीकरण, अस्थिर सप्लाई चेन और बढ़ती जलवायु परिवर्तन लागतों का सामना कर रही है। वैश्विक अनिश्चितताएं बढ़ रही हैं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का प्रभाव घट रहा है लेकिन ये बाहरी झटके न केवल भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती की परीक्षा ले रहे हैं बल्कि यह भी संकेत दे रहे हैं कि मजबूत घरेलू क्षमताओं और विविधतापूर्ण व्यापार साझेदारियों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

उच्च विकास को बनाए रखने के लिए भारत को अपने लोगों में निवेश करना होगा। हमारी कार्यबल को लगातार अपस्किल और रिस्किल होने की जरूरत है, ताकि उभरती तकनीकों की मांग और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप बेहतर उत्पादकता और गुणवत्तापूर्ण रोजगार सुनिश्चित किए जा सकें।

हमें व्यापक और सर्वसमावेशी प्रगति का लक्ष्य रखना चाहिए, ऐसी प्रगति जो सभी क्षेत्रों और समुदायों को लाभ पहुंचाए। इसलिए ध्यान किसानों, क्षेत्रीय और ग्रामीण आबादी, MSMEs से लेकर तकनीक और उन्नत विनिर्माण जैसे उभरते क्षेत्रों तक विस्तृत है।

अंतिम उद्देश्य यह है कि ‘भारत’ में रहने वाली आबादी भी उतना ही लाभान्वित हो, जितना शहरी केंद्रों के उपभोक्ता।

लेखक : शिखर अग्रवाल, चेयरमैन, BLS ई–सर्विसेज लिमिटेड

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