आज का पंचांग
दिनांक 23 अगस्त 2021
दिन – सोमवार
विक्रम संवत – 2078 (गुजरात – 2077)
शक संवत – 1943
अयन – दक्षिणायन
ऋतु – शरद
मास – भाद्रपद (गुजरात एवं महाराष्ट्र अनुसार – श्रावण)
पक्ष – कृष्ण
तिथि – प्रतिपदा शाम 04:30 तक तत्पश्चात द्वितीया
नक्षत्र – शतभिषा रात्रि 07:26 तक तत्पश्चात पूर्व भाद्रपद
योग – अतिगण्ड सुबह 08:34 तक तत्पश्चात सुकर्मा
राहुकाल – सुबह 07:55 से सुबह 09:30 तक
सूर्योदय – 06:20
सूर्यास्त – 19:01
दिशाशूल – पूर्व दिशा में
व्रत पर्व विवरण –
विशेष – प्रतिपदा को कूष्माण्ड(कुम्हड़ा, पेठा) न खाये, क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है।
शरद ऋतु में कैसे करें स्वास्थ्य की रक्षा
22 अगस्त 2021 रविवार से शरद ऋतु
शरद ऋतु में ध्यान देने योग्य महत्त्वपूर्ण बातें :
१ रोगाणां शारदी माता । रोगों की माता है यह शरद ऋतु। वर्षा ऋतु में संचित पित्त इस ऋतु में प्रकुपित होता है | इसलिए शरद पूर्णिमा की चाँदनी में उस पित्त का शमन किया जाता हैं।
इस मौसम में खीर खानी चाहिए। खीर को भोजनों में ‘रसराज’ कहा गया है। सीता माता जब अशोक वाटिका में नजरकैद थीं तो रावण का भेजा हुआ भोजन तो क्या खायेंगी, तब इंद्र देवता खीर भेजते थे और सीताजी वह खाती थी।
२ इस ऋतु में दूध, घी, चावल, लौकी, पेठा, अंगूर, किशमिश, काली द्राक्ष तथा मौसम के अनुसार फल आदि स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं।
गुलकंद खाने से भी पित्तशामक शक्ति पैदा होती है। रात को (सोने से कम-से-कम घंटाभर पहले ) मीठा दूध घूँट – घूँट मुँह में बार-बार घुमाते हुए पियें।
दिन में ७ – ८ गिलास पानी शरीर में जाय, यह स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।
३ खट्टे, खारे, तीखे पदार्थ व भारी खुराक का त्याग करना बुद्धिमत्ता है। तली हुई चीजें, अचारवाली खुराक, रात को देरी से खाना अथवा बासी खुराक खाना और देरी से सोना स्वास्थ्य के लिए खतरा है क्योंकि शरद ऋतु रोगों की माता है। कोई भी छोटा-मोटा रोग होगा तो इस ऋतु में भडकेगा इसलिए उसको बिठा दो।
४ शरद ऋतु में कड़वा रस बहुत उपयोगी है। कभी करेला चबा लिया, कभी नीम के १०-१२ पत्ते चबा लिये। यह कड़वा रस खाने में तो अच्छा नहीं लगता लेकिन भूख लगाता है और भोजन को पचा देता है।
५ पाचन ठीक करने का एक मंत्र भी है :
अगस्त्यं कुम्भकर्ण च शनिं च वडवानलम्।
आहारपरिपाकार्थ स्मरेद् भीमं च पंचमम्।
यह मंत्र पढ़ के पेट पर हाथ घुमाने से भी पाचनतंत्र ठीक रहता हैं।
६ बार-बार मुँह चलाना (खाना) ठीक नहीं, दिन में दो बार भोजन करें और वह सात्त्विक व सुपाच्य हो।
भोजन शांत व प्रसन्न होकर करें। भगवन्नाम से आप्लावित ( तर, नम ) निगाह डालकर भोजन को प्रसाद बना के खायें।
७ ५० साल के बाद स्वास्थ्य जरा नपा-तुला रहता है, रोगप्रतिकारक शक्तिदबी रहती है।
इस समय नमक, शक्कर और घी-तेल पाचन की स्थिति पर ध्यान देते हुए नपा-तुला खायें, थोड़ा भी ज्यादा खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
८ कइयों की आँखें जलती होंगी, लाल हो जाती होंगी।
कइयों को सिरदर्द होता होगा। तो एक –एक घूँट पानी मुँह में लेकर अंदर गरारा (कुल्ला) करते रहे और चाँदी का बर्तन मिले अथवा जो भी मिल जाय, उसमें पानी भर के आँख डुबा के पटपटाता जाय।
मुँह में दुबारा पानी भर के फिर दूसरी आँख डुबा के ऐसा करें। फिर इसे कुछ बार दोहराएं। इससे आँख व सिर की गर्मी निकलेगी। सिरदर्द और आँखों की जलन में आराम होगा व नेत्रज्योति में वृद्धि होगी।
९ अगर स्वस्थ रहना है और सात्त्विक सुख लेना है तो सुर्योदय के पहले उठना न भूलें। आरोग्य और प्रसन्नता की कुंजी है सुबह-सुबह वायु-सेवन करना।
सूरज की किरणें नही निकली हों और चन्द्रमा की किरणें शांत हो गयी हों, उस समय वातावरण में सात्तिवकता का प्रभाव होता है।
वैज्ञानिक भाषा में कहें तो इस समय ओजोन वायु खूब मात्रा में होती है और वातावरण में ऋणायनों का प्रमाण अधिक होता है।
वह स्वास्थ्यप्रद होती है। सुबह के समय की जो हवा है वह मरीज को भी थोड़ी सांत्वना देती है।
