नई दिल्ली। दिल्ली विधान सभा द्वारा 24 व 25 अगस्त को आयोजित दो दिवसीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के प्रथम दिन आज दिल्ली विधान मण्डल भवन के हॉल में विठ्ठलभाई पटेल: भारत के संविधान और विधायी संस्थाओं को आकार देने में उनकी भूमिका विषय पर बोलते हुए हिमाचल प्रदेश विधान सभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने कहा कि विठ्ठलभाई पटेल एक महान स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं बल्कि विधायी संस्थाओं के सशक्तीकरण तथा सुदृढ़ीकरण के अग्रदूत तथा महानायक थे।
इस सम्मेलन का आयोजन मुख्य रूप से विठ्ठलभाई पटेल के केन्द्रिय असैम्बली के प्रथम चेयरमैन के रूप में शताब्दी वर्ष पूर्ण होने तथा दिल्ली विधान सभा के (केन्द्र व राज्य) के भी शताब्दी वर्ष पूर्ण होने की यादगार में किया गया।
इस सम्मेलन का शुभारम्भ भारत के गृह मंत्री अमित शाह द्वारा किया गया तथा सम्मेलन को दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, उप- राज्यपाल विजय सक्सैना, संसदीय कार्यमंत्री भारत सरकार किरन रिजिज्जू, दिल्ली विधान सभा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता द्वारा सम्बोधित किया गया जबकि दिल्ली विधान सभा उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट ने सभी अतिथियों का सम्मेलन में भाग लेने के लिए आभार व्यक्त किया।
अपने सम्बोधन के दौरान पठानिया ने कहा कि हिमाचल विधान मण्डल भवन जिसे कौंसिल चैम्बर कहा जाता है, का निर्माण कार्य भी वर्ष 1925 में पूर्ण हुआ था तथा 20 अगस्त 1925 को तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड रीडिंग द्वारा उसका लोकार्पण किया गया।
इसे देश का प्रथम केन्द्रिय असैम्बली भवन होने का गौरव प्राप्त हुआ जिसे विठ्ठलभाई पटेल तथा मोती लाल नेहरू जैसी महान विभूतियों ने अपने विचारों तथा साहसिक कार्यप्रणाली से सुशोभित किया।
उसी कौंसिल चैम्बर में विठ्ठलभाई पटेल ने ब्रिटिश प्रतिनिधि को 2 मतों से पराजित कर देश के प्रथम निर्वाचित चेयरमैन होने का गौरव हासिल किया।
कौंसिल चैम्बर में ग्रीष्मकालीन केन्द्रिय असैम्बली का आयोजन किया जाता था जबकि दिल्ली विधान मण्डल भवन में भी तभी से केन्द्रिय असैम्बली का आयोजन किया जाता रहा है, जिसके भी आज 100 वर्ष पूर्ण हुए हैं।
उन्होंने केन्द्रिय विधान सभा के प्रथम निर्वाचित अध्यक्ष के रूप में औपनिवेशक विधायिका को एक प्रतीकात्मक संस्था से भारतीय आत्म अभिव्यक्ति और राजनीतिक अभिव्यक्ति के एक सशक्त मंच के रूप में परिवर्तित किया।
पठानिया ने कहा कि विठ्ठलभाई पटेल ने गांधी जी के अहिंसा आत्मनिर्भरता जैसे दर्शनों से प्रेरित होकर स्वाराजवादी आन्दोलन को गति प्रदान की तथा मोतीलाल नेहरू, चितरंजन दास जैसे नेताओं की अंग्रेजों के विधान परिषदों में प्रवेश को असफल बनाने के लिए अंग्रेजों की नीतियों में बाधा डालने का काम किया तथा पूर्ण स्वशासन की मांग रखने की नींव रखी।
पठानिया ने कहा कि उन्होंने ही सभा के अधिकार व स्वतंत्रता बढ़ाने का कार्य किया तथा इसके लिए अलग से एक सचिवालय की वकालत की तथा गैर सरकारी सदस्य के अधिकारों पर जोर दिया। उन्होंने ही सभा के कार्यों के लिए प्रथाओं और प्रक्रियाओं को निर्धारित कर उसकी कार्य पद्वती को आकार दिया।
